#रक्षाबंधन कब मनाया जाए
बलवंत सिंह परगाई साम्यवादी मेम्बर ऑफ़ CPIML उत्तराखंड
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संपादक: pargai news agency bageshwar, uttarakhand
“#रक्षाबंधन कब मनाया जाए: सीपीआईएमएल सदस्य के विवादित बोल, हिंदू धर्म पर उठाए सवाल.
(((जहा शिक्षा का स्तर कमजोर है, तहा कुरीतिया, अन्ध्विस्वासो का भंडार है.)))
**देहरादून:** उत्तराखंड सीपीआईएमएल के सदस्य बलवान सिंह परगाई के एक बयान ने इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में गर्माहट पैदा कर दी है। परगाई ने रक्षाबंधन की तारीख को लेकर सवाल उठाते हुए हिंदू धर्म पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे विवाद गहरा गया है। उनके इस बयान ने एक नई बहस छेड़ दी है, जिसमें धर्म, समाज, और राजनीति के जटिल पहलुओं पर चर्चा हो रही है।
परगाई ने अपने बयान में कहा, “जन्म से कोई हिंदू या हीन बुद्धि का पौदा नहीं होता, मूर्ख तुम्हें बाद में बनाया गया है। ” उन्होंने आगे हिंदू धर्म को कई कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, मनोवैज्ञानिक विकृतियों को उत्पन्न करने वाला बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू धर्म बच्चों के बौद्धिक विकास में मंदी उत्पन्न करता है और धार्मिक वर्चस्व को बढ़ावा देता है।
परगाई ने आगे मानसिक विकलांगता को धर्म, पत्थर की मूर्ति और फोटो की पूजा का कारण बताया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने हक और अधिकारों के लिए काम करना चाहिए, न कि धर्म के पीछे भागना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि धर्म इंसानियत नहीं सिखाता, बल्कि डुबो देता है।
परगाई ने मनु स्मृति, उपनिषद, 4 वेद, 18 पुराण, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों को मानसिक गुलामी का स्रोत बताया। उन्होंने कहा कि समाजशास्त्रीय अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि ये ग्रंथ समाजीकरण के लिए अनुपयुक्त हैं और इन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए ताकि संविधान को जीवित रखा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान इस तरह से तैयार किया गया है कि कोई छोटा या बड़ा समूह नष्ट न कर सके क्योंकि वह अपनी शक्ति को बढ़ाना चाहता है।
*विवाद की जड़:
*परगाई का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में रक्षाबंधन की तारीख को लेकर अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग 30 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने की बात कर रहे हैं, तो कुछ 31 अगस्त को। इस बीच, परगाई के बयान ने इस मुद्दे को और भी उलझा दिया है।
*बयान पर प्रतिक्रियाएं:
*परगाई के बयान पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। हिंदू संगठनों ने उनके बयान की कड़ी निंदा की है और इसे हिंदू धर्म का अपमान बताया है। कई लोगों ने उनके बयान को समाज में नफरत फैलाने वाला बताया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
वहीं, कुछ लोगों ने परगाई के बयान का समर्थन किया है और कहा है कि उन्होंने हिंदू धर्म में मौजूद कुरीतियों और अंधविश्वासों को उजागर करने की कोशिश की है। इन लोगों का कहना है कि धर्म के नाम पर लोगों का शोषण नहीं होना चाहिए और सभी को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए।
*राजनीतिक परिदृश्य:
परगाई का बयान राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। विपक्षी दलों ने सरकार पर हिंदू धर्म को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है और कहा है कि सरकार को सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। वहीं, सत्तारूढ़ दल ने परगाई के बयान की निंदा की है और कहा है कि सरकार सभी धर्मों का सम्मान करती है।
आगे की राह:
*परगाई का बयान एक गंभीर मुद्दा है और इस पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। यह जरूरी है कि हम धर्म के नाम पर होने वाले शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं। साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम सभी धर्मों का सम्मान करें और समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखें।
*विशेषज्ञों की राय:
इस मुद्दे पर कई विशेषज्ञों ने अपनी राय दी है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि धर्म समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल लोगों को बांटने या शोषण करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि परगाई का बयान राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो सकती है।
निष्कर्ष:
बलवान सिंह परगाई का बयान एक विवादास्पद मुद्दा है और इस पर अलग-अलग मत हैं। यह जरूरी है कि हम इस मुद्दे पर खुले मन से चर्चा करें और समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए मिलकर काम करें।
*मुख्य बिंदु:
* बलवान सिंह परगाई ने रक्षाबंधन की तारीख को लेकर सवाल उठाए और हिंदू धर्म पर कई गंभीर आरोप लगाए।
* उन्होंने हिंदू धर्म को कुप्रथाओं, अंधविश्वासों और मनोवैज्ञानिक विकृतियों को उत्पन्न करने वाला बताया।n* उन्होंने मनु स्मृति, उपनिषद, 4 वेद, 18 पुराण, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों को मानसिक गुलामी का स्रोत बताया।
* उनके बयान पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं और कई लोगों ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
* राजनीतिक गलियारों में भी यह बयान चर्चा का विषय बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुद्दे पर गहराई से विचार करने की जरूरत है और समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
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@संविधान को इस तरह से तैयार किया जाता है कि कोई छोटा या बड़ा समूह नष्ट न कर सके क्योंकि वह अपनी शक्ति को बढ़ाना चाहता है।
धार्मिक कट्टरता को रोकने के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना करना आवश्यक है.
हाँ, धार्मिक कट्टरता को रोकने के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना करना आवश्यक है। धार्मिक कट्टरता अक्सर सामाजिक अन्याय और असमानता से जुड़ी होती है। जब लोग भेदभाव, उत्पीड़न या हाशिए पर महसूस करते हैं, तो वे कट्टरपंथी विचारों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। सामाजिक न्याय, समानता, न्याय और सभी के लिए समान अवसर प्रदान करके, धार्मिक कट्टरता के लिए एक उपजाऊ जमीन को कम करता है
धार्मिक कट्टरता एक ऐसी विचारधारा है जो किसी व्यक्ति या समूह के अपने धर्म के प्रति अत्यधिक और तर्कहीन उत्साह को दर्शाती है। यह अक्सर धार्मिक सहिष्णुता और दूसरों के प्रति सम्मान की कमी के साथ जुड़ा होता है। विकिपीडिया के अनुसार धार्मिक कट्टरता के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारक शामिल हैं
समानता: न्याय: समावेशिता, सहिष्णुता:,
सामाजिक न्याय की स्थापना में और भी कई चीजें शामिल हैं, जिनमें शामिल हैं:
इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करके, धार्मिक कट्टरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है और एक अधिक सहिष्णु और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण किया जा सकता है.
संविधान ने भारत में कई महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाए हैं। इसने जाति व्यवस्था को समाप्त कर दिया है, महिलाओं को समान अधिकार प्रदान किए हैं, और शिक्षा और रोजगार के अवसरों को बढ़ाया है। संविधान ने भारत को एक मजबूत और स्थिर लोकतंत्र बनाने में भी मदद की है।
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भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने पर संविधान को निम्नं नुकसान होगा.
★*हिन्दू धर्म अनेको कुप्रथाओं, अंधविश्वासो, अनेको मनोवैज्ञानिक विकृतियों उत्त्पन्न करने वाले चित्र-मित्र, वातावरण को दूषित करने वाले उपाय, धर्मिक बर्चस्व, बौद्धिक विकास में मंदी उत्पन्न करने वाला( slowing intellectual development)—–। की शिक्षा बच्चों के लिए आति आवश्यक क्यों?
- भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने से संविधान को कई प्रकार के नुकसान हो सकते हैं। यह कदम विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं को नकारने का संकेत दे सकता है, जिससे समाज में असमानता और भेदभाव की भावना बढ़ सकती है। संविधान की मूल भावना सभी नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करना है, जो इस प्रकार के परिवर्तन से प्रभावित हो सकती है।
- हिन्दू धर्म से जुड़ी कुछ कुप्रथाएं और अंधविश्वास समाज में नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। यदि शिक्षा प्रणाली में इन तत्वों को शामिल किया जाता है, तो यह बच्चों के मानसिक विकास और बौद्धिक क्षमता को बाधित कर सकता है। ऐसे में, बच्चों को एक समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शिक्षा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।
- धार्मिक बर्चस्व और मानसिक विकृतियों के प्रभाव से बचने के लिए, शिक्षा में समावेशिता और तर्कशीलता को बढ़ावा देना आवश्यक है। यह न केवल बच्चों के लिए, बल्कि समग्र समाज के लिए भी लाभकारी होगा। एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए, हमें ऐसे विचारों को अपनाना चाहिए जो सभी के लिए समानता और सम्मान की भावना को बढ़ावा दें।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में संबंधित अपराधों के लिए सज़ा का प्रावधान है. अंधविश्वास व पुरानी मान्यताओं को बढ़ावा देकर दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए सज़ा का प्रावधान है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में विभिन्न अपराधों के लिए दंड का प्रावधान किया गया है। यह प्रावधान उन व्यक्तियों के लिए है जो अंधविश्वास और पुरानी मान्यताओं को बढ़ावा देकर दूसरों को हानि पहुँचाते हैं।
इस कानून के तहत, ऐसे कार्यों को गंभीरता से लिया जाता है, जो समाज में नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। अंधविश्वास के चलते होने वाले नुकसान को रोकने के लिए यह सज़ा आवश्यक है।
अस्पृश्यता की जड़ें: तिलक, सिंदूर और बिंदी से भेदभाव? (निर्योग्यता, एक व्यापक शब्द है जो किसी व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, संवेदी, या बौद्धिक विकास में किसी भी प्रकार की कमी को दर्शाता है)
अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यताएँ समाज में गहरी पैठ बना चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर पर तिलक लगाना या महिलाओं द्वारा सिंदूर और बिंदी का उपयोग करना, अक्सर जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है। ये प्रथाएँ व्यक्तिगत पहचान को प्रभावित करने के साथ-साथ समाज में विभाजन और असमानता को जन्म देती हैं।
इन प्रतीकों का उपयोग सामाजिक स्थान के निर्धारण के लिए एक प्रकार की निर्योग्यता का निर्माण करता है। समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए इन परंपराओं पर पुनर्विचार करना और एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। हमें इन निर्योग्यताओं को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे तभी एक सशक्त समाज का निर्माण हो सकेगा।
धार्मिक संस्थानों के माध्यम से बलात्कार , हत्या, अपहरण जैसी कुप्रथाओ को बढावा देने का विश्लेषण किया जाता है. धार्मिक कट्टरता के कारण झूठ को बढावा मिलता है.
धार्मिक संस्थानों के माध्यम से बलात्कार और हत्या को बढ़ावा देने का विश्लेषण किया जाता है। यह देखा गया है कि कुछ धार्मिक विचारधाराएँ हिंसा, बलात्कार, अपहरण को उचित ठहराने में सहायक होती हैं, जिससे समाज में असुरक्षा और भय का माहौल बनता है।
धार्मिक कट्टरता के कारण झूठ और भ्रांतियों को बढ़ावा मिलता है। जब लोग अपने विश्वासों को अंधविश्वास के रूप में अपनाते हैं, तो यह समाज में विभाजन और संघर्ष को जन्म देता है। ऐसे में सत्य की खोज और संवाद की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
इस प्रकार, धार्मिक संस्थानों की भूमिका और कट्टरता के प्रभाव को समझना आवश्यक है। समाज में शांति और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए, हमें इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
इस प्रकार, भारतीय न्याय संहिता समाज में जागरूकता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह न केवल अपराधियों को दंडित करती है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का भी प्रयास करती है।
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@भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने पर होगा संविधान को निम्न हानि।
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रक्षाबंधन कब मनाया जाए
https://thecommunistsocietyofindia.pargaiwebeng.in/2025/08/07/when-is-raksha-bandhan-celebrated/
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प्राचीन भारत: में मंदिरों की कोई अवधारणा नहीं थी
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शिक्षा का स्तर इस तरह का होना चाहिए कि—.
मार्क्स: धर्म से ऊपर मानवता, कुप्रथाओं के अंधकार से मुक्ति
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देखिये धार्मिक कुरीतिया हमारे समाज को किस तरह कुप्रभावित करती है
https://pargaiwebeng.in/see-how-religious-evils-maltreated-our-society/
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महिलाओं और बालिकाओं के नाक कान छेदना: हानिकारक प्रथा, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
https://pargaiwebeng.in/piercing-of-ears-and-nose-of-women-and-girls-harmful-practice-violation-of-constitutional-rights/
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स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको/अध्यापिकाओं पर कार्यवाही आवश्यक है
https://pargaiwebeng.in/action-is-necessary-against-teachers-who-promote-superstitions-and-bad-practices-in-schools-and-colleges/
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keeve 👎, endeavor security scope backwards security surveillance system. use ms optical recognized computer’s key board. Identify their a top
Adverse. Used asp.net web based data entry and go-to email software {www.}.
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@लेनिन की सृजनशील (सृजनात्मक शील) आत्म आजीवान मार्क्स के साम्यवादी, (समतावादी) सिद्धांतो के विश्लेषणों में व्यस्त रही। अन्ततः लेनिन ने प्रतिपादित किया कि साम्यवाद को यूरोपीय राष्ट्रओ के द्वारा पहले से ही एक शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
बिल्कुल। और इसीलिए मार्क्स ने वर्गविहीन समाज की कल्पना की थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज के समाजशास्त्री क्या कहते हैं? वे मानते हैं कि हिंदू धर्म के कुछ सामाजिक मानदंड समाज के लिए बिल्कुल अनावश्यक हैं।
हां, और इसीलिए राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों व विभागों में धार्मिक शिक्षा या प्रचार पर प्रतिबंध है। लेकिन एक और सवाल -क्या आप बता सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता में क्या अंतर है?….
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## राजनीति का सम्बन्ध सीधे समाज से है: एक गहन विश्लेषण (कार्ल मार्क्स के विचारों के सन्दर्भ में)
कार्ल मार्क्स के इस प्रसिद्ध कथन, “राजनीति का सम्बन्ध सीधे समाज से है,” की आज भी प्रासंगिकता बनी हुई है। यह कथन राजनीति के मूल स्वभाव को दर्शाता है कि यह समाज के ताने-बाने से गहराई से जुड़ा हुआ है। राजनीति केवल सत्ता हासिल करने और बनाए रखने का खेल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय और एक बेहतर भविष्य के निर्माण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
राजनीति सिद्धांत उन विचारों और सिद्धांतों से संबंधित है जो राजनीतिक संविधानों, सरकारों और सामाजिक जीवन को व्यवस्थित तरीके से आकार देते हैं। यह स्वतंत्रता, समानता, न्याय, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता आदि जैसी अवधारणाओं के अर्थ को स्पष्ट करता है। ये अवधारणाएं न केवल अकादमिक चर्चा के विषय हैं, बल्कि ये हमारे दैनिक जीवन को भी प्रभावित करती हैं। राजनीतिक सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि इन अवधारणाओं का वास्तविक जीवन में क्या अर्थ है, और हम उन्हें कैसे प्राप्त कर सकते हैं।
यह कानून के शासन, शक्तियों के पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा आदि जैसे सिद्धांतों के महत्व की जांच करता है। कानून का शासन सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हों और किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त न हो। शक्तियों का पृथक्करण सरकार की शक्तियों को विभिन्न शाखाओं में विभाजित करता है, जैसे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, ताकि कोई भी शाखा बहुत शक्तिशाली न हो जाए। न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका को कानूनों और सरकारी कार्यों को असंवैधानिक घोषित करने की शक्ति देती है।
ये सिद्धांत लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह इन अवधारणाओं के बचाव में विभिन्न विचारकों द्वारा दिए गए तर्कों की जांच करके किया जाता है। राजनीतिक सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण पहलू विभिन्न राजनीतिक विचारकों के विचारों का अध्ययन करना है। प्लेटो, अरस्तू, मैकियावेली, लॉक, रूसो, मार्क्स और गांधी जैसे विचारकों ने राजनीति के बारे में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके विचारों को समझने से हमें वर्तमान राजनीतिक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। हालांकि मार्क्स राजनेता नहीं बने, लेकिन उनके विचारों ने हर जगह राजनेताओं की पीढ़ियों को प्रभावित किया। कार्ल मार्क्स एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार और समाजशास्त्री थे।
उनके विचारों ने दुनिया भर में साम्यवादी आंदोलनों को प्रेरित किया। मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद एक अन्यायपूर्ण प्रणाली है जो श्रमिकों का शोषण करती है। उन्होंने एक ऐसे समाज की वकालत की जो वर्गहीन और समानता पर आधारित हो। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं, खासकर उन समाजों में जहां असमानता और अन्याय व्याप्त है। ऐसे समकालीन विचारक भी हैं जो हमारे समय में स्वतंत्रता या लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनका सहारा लेते हैं। वर्तमान समय में, राजनीतिक सिद्धांतकारों को स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए नए चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों ने लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर दिया है। राजनीतिक सिद्धांतकार इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नए विचारों और सिद्धांतों को विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। तर्कों की जांच के अलावा, राजनीतिक सिद्धांतकार हमारे वर्तमान राजनीतिक अनुभवों पर भी विचार करते हैं और भविष्य के लिए प्रवृत्तियों और संभावनाओं को इंगित करते हैं। राजनीतिक सिद्धांत केवल अतीत के विचारों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के बारे में भी है। राजनीतिक सिद्धांतकार वर्तमान राजनीतिक रुझानों का विश्लेषण करते हैं और भविष्य में संभावित परिदृश्यों की भविष्यवाणी करते हैं। यह जानकारी नीति निर्माताओं और नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है जो बेहतर भविष्य बनाने के लिए काम कर रहे हैं।
#भारत के संविधान में धर्म का स्थान
क्या आप जानते हैं कि भारत के संविधान में धर्म को मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं रखा गया है? यह एक ऐसा तथ्य है जो हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था को नए परिप्रेक्ष्य में देखने को मजबूर करता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जिसका अर्थ है कि राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है।
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CPIML Voter Servery Register. राजनीतिक सर्वेक्षण क्यों?
https://thecommunistsocietyofindia.pargaiwebeng.in/2024/09/29/cpiml-voter-servery-register
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https://pargaiwebeng.in/action-is-necessary-against-teachers-who-promote-superstitions-and-bad-practices-in-schools-and-colleges/
