Milord, AI is continuing the legal system it – The Communist Society of The India.
September 10, 2025

आदिवासी राष्ट्रपति: प्रतिनिधित्व या राजनीतिक चाल? हिन्दुओं के मंदिरों में दलितों (शूद्रों) का प्रवेश वर्जित क्यों?

#आदिवासी राष्ट्रपति: प्रतिनिधित्व या राजनीतिक चाल? हिन्दुओं के मंदिरों में दलितों (शूद्रों) का प्रवेश वर्जित क्यों?

Balwant Singh Pargai samyawadi member of cpiml uttarakhand

#भारत के राष्ट्रपति को पद से हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 61 में वर्णित है और इसे संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है। राष्ट्रपति को केवल संविधान के उल्लंघन के आरोप में ही हटाया जा सकता है।
+++

#आदिवासी राष्ट्रपति: प्रतिनिधित्व या राजनीतिक चाल?

+++
★भारत का राष्ट्रपति mrs. Droupadi Murmu आदिवासी समाज से चुनने का bjp का मकशद यह है कि हिंदु धर्म की कुप्रथाओ, अंधविस्वासो को फिर से उजागर करना, भारतवासीयो के दिमाग को मौन रखना, संविधान को नष्ट करना, धार्मिक अनुष्ठानो के द्वारा धार्मिक बर्चश्व पैदा करना मात्र है।
++++++

#जहां शिक्षा का स्तर कमजोर है वहां कुरीतियों का भंडार है।

Balwant Singh Pargai samyawadi member of cpiml uttarakhand
+++
यह बात सही है कि जहाँ शिक्षा का स्तर कम होता है, वहाँ सामाजिक कुरीतियाँ अधिक पाई जाती हैं। शिक्षा लोगों को जागरूक करती है, उन्हें सही-गलत का भेद बताती है और अंधविश्वासों से दूर करती है। जब शिक्षा की कमी होती है, तो लोग आसानी से गलत जानकारी और प्रथाओं का शिकार हो जाते हैं, जिससे सामाजिक बुराइयाँ पनपती हैं।
+++++

शिक्षा का स्तर कमजोर होने पर:

अंधविश्वास और रूढ़िवादी विचार:

शिक्षा की कमी के कारण लोग आसानी से अंधविश्वासों और रूढ़िवादी विचारों का पालन करते हैं, जो सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा देते हैं।
+++
भेदभाव और असमानता:
शिक्षा लोगों को समानता और न्याय के महत्व को समझने में मदद करती है। शिक्षा की कमी के कारण, लोग भेदभाव और असमानता को स्वीकार करने लगते हैं, जिससे सामाजिक बुराइयाँ बढ़ती हैं।
+++
स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं:
शिक्षा लोगों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के महत्व को समझने में मदद करती है। शिक्षा की कमी के कारण, लोग बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति लापरवाही बरतते हैं, जिससे सामाजिक बुराइयाँ बढ़ती हैं।
+++
आर्थिक पिछड़ेपन:
शिक्षा लोगों को बेहतर अवसर प्रदान करती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में मदद करती है। शिक्षा की कमी के कारण, लोग गरीबी और आर्थिक पिछड़ेपन में फंस जाते हैं, जिससे सामाजिक बुराइयाँ बढ़ती हैं।
+++
सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा:
शिक्षा लोगों को सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने और उन्हें खत्म करने में मदद करती है। शिक्षा की कमी के कारण, लोग सामाजिक बुराइयों को स्वीकार करते हैं और उनके खिलाफ आवाज नहीं उठाते, जिससे सामाजिक बुराइयाँ बढ़ती हैं।
इसलिए, शिक्षा का स्तर बढ़ाना सामाजिक कुरीतियों को कम करने का एक महत्वपूर्ण उपाय है। शिक्षा लोगों को सशक्त बनाती है, उन्हें जागरूक करती है और उन्हें बेहतर जीवन जीने में मदद करती है।
++++

++++
आदिवासी आवाज़: लोकतंत्र की असली परीक्षा
+++++
★भारत का राष्ट्रपति mrs. Droupadi Murmu आदिवासी समाज से चुनने का bjp का मकशद यह है कि हिंदु धर्म की कुप्रथाओ, अंधविस्वासो को फिर से उजागर करना, भारतवासीयो के दिमाग को मौन रखना, संविधान को नष्ट करना, धार्मिक अनुष्ठानो के द्वारा धार्मिक बर्चश्व पैदा करना मात्र है।

★धर्म:- अलगाव, हानि और कष्ट घृणा मानव स्थिति के लिए स्थानिक बने हुए हैं:-, जबकि हमारे दुख का बड़ा हिस्सा मानव निर्मित है और इसलिए धर्म समाप्त करने योग्य है, कम से कम हमारे कुछ दुख मानव निर्मित नहीं हैं। धर्म, कला और दर्शन ऐसे कष्टों की प्रक्रियाएँ हैं। यह बात कट्टर पंथी धार्मिक लोगो की अवधारणा है। धर्मनिरपेक्षता भी इसे स्वीकार करती है और इसलिए यह धर्म विरोधी नहीं है। ऐसा उनका मानना है।

##बौद्धों का नरसंहार और ब्राह्मण धर्म का उदय: एक गहन ऐतिहासिक विश्लेषण\

+++

बौद्ध धर्म, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में उत्पन्न हुआ, ने सदियों तक भारतीय समाज और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। हालांकि, मध्ययुगीन काल में, बौद्ध धर्म का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा, और ब्राह्मण धर्म (जिसे आज हिंदू धर्म के रूप में जाना जाता है) का प्रभुत्व बढ़ने लगा।

+++

ब्राहमण धर्म के अनुयायी लोगों ने प्रतिक्रांति की गोदत्त नामक बौध की हत्या की बौद्धों के विहारों को तोड़ा उनके स्थानों में मन्दिर का निर्माण किया। बौद्धों का नर संघार किया। ब्राहमण धर्म के लोगों ने समाज का वर्गीकरण कर सामाजिक वैमनस्य को और अधिक प्रखर किया। बौद्ध भी   भिक्षु ,सन्त समाज के थे।

और समाज के कुछ लोगों को शु ट शुद्र और अति शुद्ध नाम दिया और समाज के लोगों को शुद्र और अति शुद्ध नाम दिया और उनको हिंदुओं के मंदिरो में प्रवेश वर्जित कर दिया। साथ ही साथ महिलाओ का भी वर्गीकरण शुरू कर दिया उन्हें असामाजिक तत्व मानकर समाज से बाहर निकल दिया समाज में महिलाओ के साथ भेदभाव शुरू कर दिया साथ ही साथ अनेकों कुप्रथाओ व अंधविस्वासो के अंधकार में धकेल दिया। ब्राहमण धर्म के लोगों ने महिलाओं को काल्पनिक देवी देवताओं के प्रति आश्रित कर दिया. पूर्ब बौद्ध काल में मंदिरों का कोई concept नही है। यह बात हमे इतिहास बताता है।

बहुजनों के पुरखे हिन्दू नहीं बौद्ध थे महाबोधि महाविहार बहुजनों की विरासत है!

+++

भारत के विशाल और विविध इतिहास में बौद्ध धर्म का उदय छठी शताब्दी ईसा पूर्व में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है. यह धर्म न सिर्फ धार्मिक मान्यताओं को redefine करने में सफल रहा, बल्कि सामाजिक-धार्मिक संरचना पर भी गहराई से असर डालता रहा. वक्त के साथ यह प्रभाव घटा, और कई जगहों पर ब्राह्मण-आधारित धार्मिक प्रणालियों की मजबूत जगह बनी रही. इतिहासकार इस परिवर्तन को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं—राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक.

छठी और पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान भारत में धार्मिक विविधता तेज़ी से पनपी. बौद्ध और जैन मतों की उभार से सामाजिक-धार्मिक बहसों में नया दायरा खुला. कुछ जिलों में मंदिर-धारणा, तीर्थ-यातना, और विविध प्रकार के साधन-सामग्री उभरने लगे, जबकि अन्य क्षेत्रों में ब्राह्मणिक पूजन पद्धति और वैदिक पाठ के मानक अधिक प्रचलित हुए. इस दौर के इतिहासकारों के अनुसार, यह परिघटना सामाजिक संरचना की जटिलता को दर्शाती है: एक तरफ भिन्न मत-मार्गों के बीच संवाद और सौहार्द, दूसरी तरफ मतभेदों के कारण संघर्ष और राजनीतिक-पारम्परिक टकराव.

स्वतंत्रता आंदोलन के कालखंड की तरह, प्राचीन भारत के धार्मिक-राजनीतिक परिदृश्य में भी विविध शक्तियाँ प्रतिद्वंद्वी रहीं. बौद्ध विहार, जिन्होंने समाज के अनेक वर्गों को नैतिक और दैनंदिन जीवन में मार्गदर्शन दिया, ने कुछ स्थानों पर शासन-सत्ता के साथ साझेदारी बनाई. वहीं, कुछ क्षेत्रों में ब्राह्मण-समाज की संस्थागत संरचना मजबूत होते गई, जिसका प्रभाव सामाजिक-नैतिक मानदंडों पर पड़ा. यह केवल तात्कालिक संघर्ष नहीं था; बल्कि यह एक दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया थी जिसमें भूमि-स्वामित्व, कर-राजस्व, और शिक्षा के क्षेत्र में अवसरों की उपलब्धता भी सामाजिक पूर्वाग्रहों को निर्धारित करती थी.

महत्त्वपूर्ण बहसों के बीच यह भी देखा गया कि मंदिर-विहार के निर्माण, संरक्षण और प्रशासन में बदलाव आए. कुछ स्थानों पर मंदिर-निष्ठा और समकालीन देव-पूजा की पद्धतियाँ विकसित हुईं, जबकि अन्य क्षेत्रों में विद्वानों के बीच विविध मतप्रणालियाँ चलती रहीं. ऐतिहासिक कथाओं और पुरावशेषों के आधार पर कहा गया है कि भिक्षु और साधु समाज के सदस्य रहे, और इन समूहों के भीतर भी वर्गीकरण की रेखाएं उभरती रहीं—जो बाद के समय में सामाजिक असमानताओं के विषय बन गईं.

ब्राह्मण धर्म की प्रमुखता के उभार को एक बहु-आयामी प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए. राजनीतिक सत्ता, शाही परिवारों की धार्मिक-राजनीतिक रणनीतियाँ, और सामाजिक-आर्थिक संस्थाओं के मेल ने एक ऐसी स्थिति बनाई जिसमें वर्ण-आधारित व्यवस्था को स्थायित्व मिला. परन्तु यह भी सच है कि बौद्ध-वर्षनों के विशाल प्रभाव के बावजूद, बहुजन समुदायों के इतिहास के बारे में आधुनिक इतिहासकारों में विविध मत प्रचलित हैं. बहुजन—जिनके पितृ-परंपरा के रूप में कुछ स्रोत उन्हें बौद्ध मानते हैं—का इतिहास भी भारतीय सांस्कृतिक रूपरेखा का अभिन्न हिस्सा रहा है. बहुजन समुदायों के विरासत संबंधी दावों और पहचान की बहस आज भी अकादमिक चर्चा का विषय है.

समाज-शास्त्रीय विश्लेषण यह बताता है कि सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन का तंत्र एक नहीं, बल्कि अनेक कारणों से संचालित रहा. शिक्षा के अवसर (जिन्हें कभी-कभी ब्राह्मण-आधारित संरचना नियंत्रित करती थी), व्यापार मार्गों की वृद्धि, और स्थानीय राजनीति—इन सभी ने धार्मिक उन्नति और सामाजिक-धार्मिक संरचना के बीच समीकरण तय किया. महिलाओं, दलित-आदिवासी और अन्य marginalized समूहों के जीवन पर भी इन परिवर्तनों के प्रभाव पड़े. इतिहास में इन समूहों के बारे में मिलते विवरणों की व्याख्या में सावधानी बरतना आवश्यक है ताकि निष्कर्ष सामान्यीकरण से बचें.

ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरावशेषों के विविध प्रमाणों के बावजूद, आज के शोधकों का एक सामान्य निष्कर्ष यह है कि भारतीय इतिहास के इस कालखंड में परिवर्तन श्वेत-श्वेत नहीं थे. कुछ क्षेत्रों में बौद्ध-रत्न-विहारों के लिए संपत्ति और संरक्षण की सुविधा बढ़ी, तो कुछ स्थानों पर ब्राह्मणिक शासन-प्रणालियों ने राजसी सत्ता के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित कर लिया. यह एक संतुलन का दृश्य था जिसमें हर क्षेत्र की अपनी-अपनी विशिष्टताएँ और असमानताएँ थीं.

आज की पीढ़ी के लिए यह सवाल बना रहता है कि इन ऐतिहासिक प्रवृत्तियों के आज के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से क्या संबंध हैं. क्या पुरानी वैचारिक बहसें आधुनिक समाज की असमानता में जड़ें रखती हैं, या वे सिर्फ ऐतिहासिक संदर्भों में ठहर गई हैं? सबसे बड़ी बात यह है कि इतिहास से मिलने वाले पाठ हमें सह-अस्तित्व, संवाद और एक-दूसरे के विश्वासों के सम्मान के महत्व की याद दिलाते हैं. किसी भी बहु-विध धार्मिक या सामाजिक इतिहास की समीक्षा करते समय यह आवश्यक है कि हम एक दूसरे को समझने की कोशिश करें, पूर्वाग्रहों से बचें और प्रमाण पर आधारित विश्लेषण करें.

प्रमाण और पथ: इतिहास में बहस के केंद्र रहे प्रश्न\n- बौद्ध धर्म की उत्तरोत्तर कमी के पीछे क्या कारण थे? क्या यह पूंजीकरण, शासक-चालित परिवर्तन, या वैचारिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम था?

ब्राह्मण समुदाय के उदय ने समाज-प्रणाली पर क्या प्रभाव डाला? क्या यह सामाजिक-आर्थिक संरचना को स्थिर करने में भूमिका निभाई?

बहुजन समूहों के इतिहास को कैसे संजोया जाए ताकि यह समग्र भारतीय इतिहास का हिस्सा बने?

मंदिर-विहार और शास्त्रीय शिक्षाप्रणालियाँ कैसे विकसित हुईं, और किन-किन कारणों से उनका स्वरूप बदला?

अंत में, यह कहा जा सकता है कि इतिहास एक जीवित प्रथा है जो समय के साथ बदले, परंतु उसकी सरंचनाओं के गुणधर्म आज भी व्यक्त होते हैं. बहसों की विविधता, स्थापनाओं की बहुलता और न्यायपूर्ण विश्लेषण की आवश्यकता आज भी प्रासंगिक है. यह लेख उन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को उभारता है जो हमारे समाज के अन्दर के इतिहास और पहचान की समझ को गहराते हैं

++

ब्राह्मण धर्म का विकास:
ब्राह्मण धर्म का विकास वैदिक काल के आधार पर हुआ है, जब आर्यों ने भारत में प्रवेश किया और अपनी धार्मिक मान्यताओं को स्थानीय परंपराओं के साथ मिला दिया.

हिन्दू समुदाय पिंडिती का है का इतिहास सबसे आधुनिक है। इस धर्म को वेदकाल से भी पूर्व का माना जाता है, क्योंकि वैदिक काल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है। यहां शताब्दियों से मौखिक (तु वेदस्य मुखं) परंपरा चलती रही, जिसके द्वारा इसका इतिहास व ग्रन्थ आगे बढ़ते रहे। उसके बाद इसे लिपिबद्ध (तु वेदस्य हस्तौ) करने का काल भी बहुत लंबा रहा है। हिन्दू धर्म के सर्वपूज्य ग्रन्थ हैं वेद। वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। वेदों के रचनाकाल का आरंभ ८वी सदी से हुआ है।

यानि यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। कहीं कहीं ऋग्यजुस्सामछन्दांसि को वेद ग्रंथ से न जोड़ उसका छंद कहा गया है। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुंरवा राजर्षि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया। वहीं एक अन्य मान्यता अनुसार कृष्ण के समय में वेद व्यास कृष्णद्वैपायन ऋषि ने वेदों का विभाग कर उन्हें लिपिबद्ध किया था।

मान्यतानुसार हर द्वापर युग में कोई न कोई मुनि व्यास बन वेदों को 4 भागों में बाटते हैं।
+++
यह बात बिल्कुल सटीक है, खासकर जब बलवंत सिंह परगाई जी ने इस मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है कि आदिवासी राष्ट्रपति का चयन एक राजनीतिक चाल से ज्यादा कुछ नहीं।

देखिए, बलवंत सिंह परगाई जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि आदिवासी राष्ट्रपति का चयन केवल एक राजनीतिक चाल है, जिसका उद्देश्य धार्मिक वर्चस्व स्थापित करना है।
++++
भारत के संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष – शब्दों को हटाए जाने संबंधी संघ नेता होसबोले की टिप्पणी पर भाकपा (माले) महासचिव दीपंकर भट्राचार्य की प्रतिक्रिया

उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत के संविधान की प्रस्तावना से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग करने वाली याचिकाओं को पिछले वर्ष खारिज किये जाने के बावजूद आरएसएस ने इस मांग को पुनः दोहराया है. इसके मूल में संघ -भाजपा
का संविधान बदलने और उसके लोकतांत्रिक तत्वों को नष्ट करने का मंसूबा है. समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ ये विशेषण भले ही, 42 वें संविधान संशोधन के बाद
स्पष्ट रूप में जोड़े गए हों, पर भारत की धर्मनिरपेक्ष बनावट और समाजवादी मिजाज को मजबूत करने वाले विभिन्न अनुच्छेद हमेशा से उसके मूलभूत ढांचे के अंग थे. दरअसल आर एस एस को तो ‘संप्रभु और
‘लोकतांत्रिक समेत संवैधानिक गणतंत्र के हर चिन्ह से इन्हें परेशानी है।

★धर्म की पारंगतता, मनुष्य के जीवन स्तर, रहन – सहन, व्यक्तत्व में विकृत पैदा करने वाली और अनेको अंधविश्वास व, कुप्रथाओ को उत्पन्न करने वाली एक और अन्य प्रकार की सामाजिक प्रक्रिया है।
धर्म की पारंगतता एक दीर्घ कालिक बीमारी है। यह लोगो को लम्बे समय से पीड़ित कर रही है। महिलाओ को यह बीमारी ज्यादा ही सताए हुए है( victimized )। ठीक होने का नाम नही ले ती है।अगर ठीक होने का नाम लेती भी है तो थोड़े दिनों के बाद लैत आती है। अकेला मनुष्य छुटकारा चाह कर भी अक्षम है।
**
#सामाजिक न्याय की बात करते हुए हमें नीत निर्देशक सिद्धान्तों की बात भी नहीं भूलनी चाहिए। धार्मिक समुदायो को मान्यता न देकर इस समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकता है। माना जाता है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म को निजी मामला के रुप में स्वीकार करते है। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है।लोकतंत्र का मतलब है साथर्क भागीदारी धर्मनिरपेक्षता, पंथनिरपक्षता या सेक्युलरवाद धार्मिक संस्थानों व धार्मिक उच्चपदधारियों से सरकारी संस्थानों व राज्य का प्रतिनिधित्व करने हेतु शासनादेशित लोगों के पृथक्करण का सिद्धान्त है। यह एक आधुनिक राजनैतिक एवं संविधानी सिद्धान्त है।
++++
आप सोच रहे होंगे कि भारत में 10.5 करोड़ आदिवासी हैं, लेकिन क्या वास्तव में उनकी आवाज़ सुनी जा रही है? आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे जो हमारे लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

यह बात बिल्कुल सटीक है, खासकर जब बलवंत सिंह परगाई जी ने इस मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है कि आदिवासी राष्ट्रपति का चयन एक राजनीतिक चाल से ज्यादा कुछ नहीं।

देखिए, यह मुद्दा बहुत गहरा है। मैंने पिछले महीने झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों का दौरा किया, जहां 26% आदिवासी आबादी है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है।

हम्म… तो क्या आप कह रही हैं कि प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा?

बिल्कुल! आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता दर मात्र 59% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 74% है। स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो हर 10,000 की आबादी पर सिर्फ 1 डॉक्टर है।

हां, और इसलिए हमें लगातार इस पर ध्यान देना होगा। क्योंकि जब तक आदिवासी समुदाय की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक कोई भी राजनीतिक कदम सिर्फ दिखावा ही साबित होगा।
+++
आदिवासी महिला राष्ट्रपति: बदलाव या राजनीतिक खेल?
+++
आप जानते हैं कि भारत के 75 साल के इतिहास में पहली बार एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनी हैं, लेकिन क्या यह सामाजिक परिवर्तन का वास्तविक प्रतीक है या सिर्फ राजनीतिक रणनीति?

हम्म… यह एक दिलचस्प सवाल है, और इसके कई पहलू हैं जो हमें समझने होंगे।

देखिए, जब हम द्रौपदी मुर्मू जी के चुनाव की बात करते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का चुनाव नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 8.6% आबादी आदिवासी समुदाय की है, और उनका प्रतिनिधित्व उच्च पदों पर बेहद कम रहा है।

और यही वजह है कि कुछ लोग इस चुनाव को एक बड़े सामाजिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

लेकिन साथ ही, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस नियुक्ति के पीछे एक गहरा धार्मिक और राजनीतिक एजेंडा है। वे कहते हैं कि इसका इस्तेमाल कुछ परंपरागत मान्यताओं को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है।

तो क्या आप कहना चाहेंगी कि यह एक दोधारी तलवार की तरह है?

बिल्कुल! और इसलिए हमें इसके दोनों पहलुओं को समझना होगा। एक तरफ जहां यह सामाजिक समावेश का प्रतीक है, वहीं दूसरी तरफ इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में आदिवासी समुदाय में साक्षरता दर सिर्फ 59% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 74% है।

और शायद यही वजह है कि इस चुनाव को लेकर इतनी बहस हो रही है।

देखिए, आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास की गति अभी भी धीमी है। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है, शिक्षा का स्तर कम है, और रोजगार के अवसर सीमित हैं। ऐसे में एक आदिवासी महिला का राष्ट्रपति बनना तो महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

हम्म… तो आप कह रही हैं कि हमें वास्तविक मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा।

बिल्कुल! और इसलिए यह समय है जब हमें इस चुनाव के प्रतीकात्मक महत्व के साथ-साथ वास्तविक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में भी काम करना होगा।

लेकिन क्या यह सब इतना आसान होगा?

नहीं, यह एक जटिल प्रक्रिया है। लेकिन याद रखिए, हर बड़े बदलाव की शुरुआत छोटे कदमों से ही होती है। और शायद यही वक्त है जब हमें इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

क्या आप जानते हैं कि भारत में हर साल लगभग 40,000 लोग अंधविश्वास और धार्मिक कुरीतियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं? आज हम बात करेंगे धर्म के नाम पर फैली इन कुरीतियों की और कैसे इनसे मुक्ति पाई जा सकती है।

देखिए, इसका सबसे बड़ा समाधान है शिक्षा और जागरूकता। केरल में, जहां साक्षरता दर 96% है, वहां ऐसी घटनाएं बहुत कम होती हैं। लेकिन सिर्फ शिक्षा ही काफी नहीं है —हमें सामाजिक सोच में भी बदलाव लाना होगा।

मैंने सुना है कि कुछ राज्यों में इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। जैसे महाराष्ट्र में अंधश्रद्धा विरोधी कानून।

हां, और राजस्थान में एक अनूठी पहल शुरू की गई है। वहां के कुछ गांवों में युवाओं ने “No दहेज” अभियान शुरू किया है। इससे प्रेरित होकर पिछले साल 200 से ज्यादा शादियां बिना दहेज के हुईं।

हाँ, और यह कथन वर्तमान परिस्थिति में बहुत प्रासंगिक है। क्योंकि जब हम किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए चुनते हैं, तो उनका चरित्र और योग्यता सबसे महत्वपूर्ण मानदंड होने चाहिए।
+++
#महिलाओं और बालिकाओं के नाक कान छेदना: हानिकारक प्रथा, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

क्या ग़रीबों व मानसिक रूप से विकलांग लोगो का है धर्म?

मानसिक विकलांगता के कारण मनुष्य जाति (पुरोहित, ब्रह्मण), धर्म, पत्थर की मूर्ति, फोटो को पूजना शुरू करते है। जब की आप को अपने हक अधिकारों के लिए काम करना चाहिए। धर्म आपको कभी भी इंसानियत नहीं सिखाता है। यह धर्म आपको डुबो देगा! डुबो देगा! डुबो देगा!!!

#जहा शिक्षा का स्तर कमजोर है, वहा कुरीतिया और अंधविश्वासओ का भंडार है.

#महिलाओं को चाहिए मुक्ति आन्दोलन)
+++
मनोवैज्ञानिक प्रभाव
नाक और कान छेदने से महिलाओं के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कुछ महिलाओं को यह प्रथा अपमानजनक और शोषणकारी लगती है। इसके अलावा, छेदने के बाद निशान बनने से कुछ महिलाओं में हीन भावना पैदा हो सकती है।

कानूनी दृष्टिकोण
भारतीय संविधान महिलाओं को समानता का अधिकार देता है। इस अधिकार के तहत, महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता है। नाक और कान छेदने की प्रथा महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण है, क्योंकि यह प्रथा केवल महिलाओं पर लागू होती है।

@धर्म और शोषण (आधुनिक समाज में आस्था के नाम पर धर्म (ब्राह्मण वाद) बच्चियों का शोषण करती है) रोकने के उपाय निम्नवत है.

+++
महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन:- नाक-कान छेदने की प्रथा, महिलाओं के मानवाधिकारों का स्पष्ट हनन है। यह प्रथा, महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है। इस प्रथा के कारण, महिलाओं को जिंदगी भर दर्द और तकलीफ सहनी पड़ती है।

इसके अलावा, यह प्रथा, महिलाओं को सामाजिक रूप से भी कमजोर करती है। इस प्रथा के कारण, महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता है और उन्हें पुरुषों के अधीन रहना पड़ता है।

समाधान
इस प्रथा को समाप्त करने के लिए जागरूकता फैलाना जरूरी है। लोगों को इस प्रथा के हानिकारक प्रभावों के बारे में बताना चाहिए। इसके अलावा, सरकार को इस प्रथा को रोकने के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए।
+++
भारत के राष्ट्रपति को पद से हटाने की प्रक्रिया को महाभियोग कहा जाता है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 61 में वर्णित है और इसे संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है। राष्ट्रपति को केवल संविधान के उल्लंघन के आरोप में ही हटाया जा सकता है।
+++
शिक्षा का स्तर इस तरह का होना चाहिए कि++
https://pargaiwebeng.in/website-project-for-student-school-colleges-and-educators/
+++
@जहां शिक्षा का स्तर उचित नहीं है वहां कुरीतिया और अंधविश्वासओ का भंडार है।
++++
कानून होने के बावजूद भी ब्राहमण जो आज भी अपनी सर्वश्रेष्ठता के दंभ से चूर अपनी विषमता वादी अंधश्रद्धा वादी सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए तरह तरह के षडयंत्र करते हुए सतत प्रयास रत हैं, अपने हिस्से की शर्त पर जो उनकी खुलकर मदद कर रहे हैं यानी क्षत्रिय और वैश्य इन दोनों शब्दों से भी आपको दिक्कत नहीं है।

दिक्कत है तो सिर्फ शूद्र शब्द एवं कम्युनिस्ट शब्द से क्योंकि ब्राह्मणों ने षड्यंत्र पूर्वक इन पर नीचता का स्टीकर लगा दिया है।
+++
इसके अलावा उनके पास भारत के समान नागरिकों के रूप में भी अधिकार हैं, जैसे कि कोई अन्य वयस्क पुरुष या महिला: • समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14)। • भेदभाव के खिलाफ सही (अनुच्छेद 15)। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून की उचित प्रक्रिया का अधिकार (अनुच्छेद 211 का अधिकार तस्करी और foecd एन बी श्रम (अनुच्छेद 23) से सुरक्षित होने का अधिकार है। • लोगों के कमजोर वर्गों का अधिकार peoect और सभी रूपों के सभी रूपों (अनुच्छेद)
+++
Balwant Singh Pargai samyawadi member of cpiml uttarakhand
+++
हिन्दुओं के मंदिरों में दलितों (शूद्रों) का प्रवेश वर्जित क्यों?
जन्म से कोई हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई पैदा नहीं होता, मूर्ख बाद में बनाए जाते हैं:
https://pargaiwebeng.in/see-how-religious-evils-affect…
(Balwant Singh Pargai Samywadi member of cpiml Uttarakhand)
## जन्म से कोई हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई पैदा नहीं होता, मूर्ख बाद में बनाए जाते हैं: विवादित बयान पर मचा बवाल ** एक विवादास्पद बयान ने देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है।
बयान में कहा गया है कि “जन्म से कोई हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध, जैन आदि पैदा नहीं होता है। मूर्ख आपको बाद में बनाया जाता है।” इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जहां कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं, वहीं कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बता रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर बहस तेज हो गई है। कुछ राजनीतिक दल और संगठन इस बयान का समर्थन कर रहे हैं, जबकि अन्य इसे समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश बता रहे हैं।

*कागज की खोज के बाद लिखे गए ग्रंथ मानसिक गुलामी के स्रोत: आरोप* बयान में आगे कहा गया है, “कागज की खोज के बाद लिखे गए मनु स्मृति, उपनिषद, 4 वेद मंत्र, 18 पुराण, रामायण, महाभारत आदि ब्राह्मण भाग के ग्रंथ मानसिक गुलामी के स्रोत हैं। इन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए ताकि संविधान को जीवित रखा जा सके।” इस आरोप ने विवाद को और बढ़ा दिया है।

इस बयान का समर्थन करने वालों का कहना है कि ये ग्रंथ जातिवाद और भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और इसलिए इन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए। वहीं, विरोध करने वालों का कहना है कि ये ग्रंथ भारतीय संस्कृति और इतिहास का अभिन्न अंग हैं और इन्हें नष्ट करना गलत होगा।

*संविधान और धर्म के बीच अलगाव की वकालत* बयान में संविधान और धर्म के बीच अलगाव की भी वकालत की गई है। इसमें कहा गया है, “धर्म और राज्य के बीच अलगाव निषेध नहीं हो सकता है। क्योंकि धर्म से अनुमोदित रीत रिवाज मनुष्य को उसकी गरिमा अथवा आत्म सम्मान से वंचित करता है।” इस बयान का समर्थन करने वालों का कहना है कि धर्म को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए ताकि सभी नागरिकों को समान अधिकार मिल सकें। वहीं, विरोध करने वालों का कहना है कि धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और इसे राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है।

*वामपंथी संगठनों को एकजुट होने का आह्वान* बयान में व्यवस्था को बदलने के लिए सभी वामपंथियों और वामपंथी संगठनों को एक होने का आह्वान किया गया है। इसमें कहा गया है, “व्यवस्था को बदलने के लिए सभी वामपंथियों और वामपंथी संगठनों को एक होना होगा अन्यथा ये माना जायेगा की ये मेहनतकश जनता को सिर्फ मूर्ख बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।” इस आह्वान का समर्थन करने वालों का कहना है कि वामपंथी संगठनों को एकजुट होकर गरीबों और वंचितों के अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए। वहीं, विरोध करने वालों का कहना है कि वामपंथी संगठन समाज में अराजकता फैलाना चाहते हैं।
*सामाजिक संरचना और मनुष्य की सर्जनात्मकता पर जोर* बयान में दुखिम, कार्ल मार्क्स और भारतीय सामाजिक चिंतकों के विचारों का हवाला देते हुए सामाजिक संरचना की बाध्यता और मनुष्य की सर्जनात्मकता पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सामाजिक संरचना मनुष्य को बांधती है, लेकिन मनुष्य की सर्जनात्मकता उसे बदलने की क्षमता रखती है। बयान में हिंदू धर्म के सामाजिकरण के मापदंड के प्रतिरूपों को सामाजिकरण के लिए अनुपयुक्त बताया गया है और कहा गया है कि महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए इन प्रतिरूपों को रोका जाना चाहिए।

*विवाद और प्रतिक्रियाएं* इस बयान पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इस बयान की निंदा की है और इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया है। वहीं, कुछ राजनीतिक दलों ने इस बयान का समर्थन किया है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला बताया है। सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर बहस जारी है। कुछ लोग इस बयान का समर्थन कर रहे हैं, वहीं कई लोग इसे समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश बता रहे हैं। इस विवादित बयान ने एक बार फिर देश में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर बहस को तेज कर दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस आगे क्या रुख लेती है।

*आगे क्या होगा?* इस बयान के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। क्या सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करेगी? क्या इस बयान के खिलाफ कोई कानूनी का
+++
#हमारा संविधान धर्म को नष्ट करने में कैसे सहायक है?
(बलवंत सिंह परगाई साम्यवादी
+++
१)धार्मिक संगठनो के द्वारा बलतकार जौसे घटनाओं के विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
२)धार्मिक संगठनो के द्वारा हत्या जौसे घटनाओं के विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
३)धार्मिक संगठनो के द्वारा अपहरण जौसी घटनाओं के विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
४)धार्मिक संगठनो के द्वारा छुआ छुत को बढावा देने वाले जौसे घटनाओं विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
5)धार्मिक संगठनो के द्वारा अस्पृश्यता और सामाजिक निर्योग्यता: (Disqualification) ( सिर में तिलक, सिंदूर और बिंदी जैसी परंपराएँ) जौसे कुप्रथाओ जौसे घटनाओं के विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
6)धार्मिक संगठनो के द्वारा अतिशयोक्ति, “भ्रामक” ( भ्रमित करने वाला,) धोखेबाज” भ्रष्टाचार (Corruption) जौसे घटनाओं के विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
7)धार्मिक संगठनो के द्वारा लूट-पाट जैसे घटनाओं विश्लेषण के प्रसारण (broadcast) पर रोक लगाकर
+++
हमारा संविधान धार्मिक संगठनों की गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बलात्कार जैसी गंभीर घटनाओं के प्रसारण पर रोक लगाकर समाज में जागरूकता और सुरक्षा को बढ़ावा देता है। इस प्रकार, संविधान यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों का सही तरीके से विश्लेषण किया जाए, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव आ सके।
+++
पुराने धार्मिक, राजनैतिक, तथा एतिहासिक बर्चस्व
के प्रतिमानों को ध्वस्त कर एक नए वर्गहीन व समतामूलक समाज की स्थापना की जाएगी, न्याय से कोई बंचित नही रहेगा।
@धर्म, भाषा, क्षेत्र वाद, जाति के आधर पर निक्तियो में कोई विभेदाना नहीं होगी।
+++
#मार्क्स के संघवाद की कल्पना कीजिये? संविदा, ट्रस्ट, अंतरराष्टी बैंक को परिभाषित कीजिए?
+++
#लेनिन के संगठनकारी व नेत्रतुकारी नीति से आप क्या समझते है?
+++
लेनिन की संगठनकारी और नेत्रतुकारी नीति का मुख्य उद्देश्य क्रांति के लिए एक मजबूत और संगठित पार्टी का निर्माण करना था। उन्होंने यह समझा कि एक सशक्त संगठन ही क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकता है। इसके लिए उन्होंने कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और उन्हें एक साझा लक्ष्य की ओर अग्रसर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
लेनिन ने अपने नेतृत्व में पार्टी के भीतर अनुशासन और एकता को बनाए रखने के लिए कई रणनीतियाँ अपनाईं। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सभी सदस्य पार्टी के सिद्धांतों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें। इसके साथ ही, उन्होंने विचारों के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित किया, ताकि संगठन में नवाचार और सुधार की संभावनाएँ बनी रहें।
उनकी नीति ने न केवल रूस में बल्कि विश्वभर में क्रांतिकारी आंदोलनों को प्रेरित किया। लेनिन के दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट किया कि एक संगठित और दृढ़ नेतृत्व ही किसी भी क्रांति की सफलता की कुंजी है। इस प्रकार, उनकी संगठनकारी और नेत्रतुकारी नीति ने राजनीतिक संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत किया।
+++
@लेनिन की सृजनशील (सृजनात्मक शील) आत्म आजीवान मार्क्स के साम्यवादी, (समतावादी) सिद्धांतो के विश्लेषणों में व्यस्त रही। अन्ततः लेनिन ने प्रतिपादित किया कि साम्यवाद को यूरोपीय राष्ट्रओ के द्वारा पहले से ही एक शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
लेनिन की सृजनात्मक आत्मा मार्क्स के साम्यवादी सिद्धांतों के गहन विश्लेषण में संलग्न रही। उन्होंने इन सिद्धांतों को अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने का प्रयास किया।
अंततः, लेनिन ने यह निष्कर्ष निकाला कि साम्यवाद को पहले से ही यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्वीकार किया जा चुका है। यह उनके विचारों का एक महत्वपूर्ण पहलू था, जिसने साम्यवादी आंदोलन को नई दिशा दी।
इस प्रकार, लेनिन का कार्य न केवल मार्क्स के सिद्धांतों का पुनर्व्याख्या था, बल्कि यह साम्यवाद के विकास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी साबित हुआ। उनके विचारों ने वैश्विक स्तर पर साम्यवादी विचारधारा को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *