Milord, AI is continuing the legal system it – The Communist Society of The India.
July 30, 2025

साम्यवाद एक नई सामाजिक, आर्थिक, एवं राजनितिक विचारधारा का नाम है. (कार्ल मार्क्स)

# मार्क्स के नृजातीय शोध कार्य के बारे में आपको परचित करने का मौका दिया जा रहा है.

#कार्ल मार्क्स एक दूरदर्शी विचारक थे जिन्होंने दुनिया को देखने के तरीके को बदल दिया। उनके विचारों ने दुनिया भर में सामाजिक आंदोलनों और क्रांतियों को प्रेरित किया है, और आज भी उनके विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है। मार्क्स के विचार हमें पूंजीवाद की आलोचना करने, सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष करने और एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

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#मार्क्स ने मानवता को धर्म के उपर रखने के कहा. मार्क्स का मत था कि, धर्म लोगो को वास्तिक समस्याओ से दूर करने बजाय. उन्हें कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो के अंधकार में धकेलता है.

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# मार्क्स के नृजातीय शोध के बारे में आपको परिचय करने का मौका दिया जा रहा है

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मार्क्स के नृजातीय शोध में, उनका ध्यान मुख्य रूप से ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष और उत्पादन के तरीकों पर था। उन्होंने समाज को एक ऐसे ढांचे के रूप में देखा जो आर्थिक संबंधों से निर्धारित होता है, और उनका मानना था कि ये संबंध वर्ग संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन को जन्म देते हैं

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मार्क्स का नृजातीय शोध एक जटिल और प्रभावशाली सिद्धांत है जो समाज के अध्ययन के लिए एक शक्तिशाली ढांचा प्रदान करता है। उनके विचारों ने न केवल सामाजिक विज्ञानों को प्रभावित किया है, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को भी प्रेरित किया है

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#क्या गरीबो व मानसिक रूप से विकलांग लोगो का है धर्म?

@#मानसिक विकलांगता के कारण मनुष्य जाति (पुरोहित, ब्रह्मण), धर्म, पत्थर की मूर्ति, फोटो को पूजना शुरू करते है। जब की आप को अपने हक अधिकारों के लिए काम करना चाहिए। धर्म आपको कभी भी इंसानियत नहीं सिखाता है। यह धर्म आपको डुबो देगा! डुबो देगा! डुबो देगा!!!

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#मार्क्स ने मानवता को धर्म के उपर रखने के कहा. मार्क्स का मत था धर्म लोगो को वास्तिक समस्याओ से दूर करने बजाय. उन्हें कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो के अंधकार में धकेलता है.

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कार्ल मार्क्स एक दूरदर्शी विचारक थे जिन्होंने दुनिया को देखने के तरीके को बदल दिया। उनके विचारों ने दुनिया भर में सामाजिक आंदोलनों और क्रांतियों को प्रेरित किया है, और आज भी उनके विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है। मार्क्स के विचार हमें पूंजीवाद की आलोचना करने, सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष करने और एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

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#जाती भेद-भाव मंदिरों में समानता की खोज.

मंदिरों में जातिगत भेदभाव एक जटिल मुद्दा है, जिसका समाधान खोजने के लिए समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारतीय संविधान समानता का अधिकार प्रदान करता है, और मंदिरों में भी सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए

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संवैधानिक प्रावधान:

भारतीय संविधान अनुच्छेद 14, 15, और 17 में समानता और भेदभाव के निषेध का प्रावधान करता है।

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सामाजिक आंदोलन:

कई सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों ने मंदिरों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई है और समानता की मांग की है।

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कानूनी उपाय:

सरकार ने जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए कई कानून बनाए हैं, लेकिन उनका प्रभावी कार्यान्वयन एक चुनौती है।

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जागरूकता अभियान:

शिक्षा और जागरूकता अभियान के माध्यम से, लोगों को समानता और न्याय के महत्व को समझाया जा सकता है।

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मंदिरों में सुधार:

मंदिरों में भी समानता स्थापित करने के लिए, सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।

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मंदिरों में समानता की खोज के लिए आवश्यक है: #संविधान और कानून का सम्मान: #संविधान और कानूनों में समानता के प्रावधानों का पालन करना।

@सामाजिक न्याय की स्थापना:

@जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना करना।

#शिक्षा और जागरूकता:

शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से, लोगों को समानता और न्याय के महत्व को समझाना।

#सामुदायिक भागीदारी:

मंदिरों में समानता स्थापित करने के लिए, समुदाय के सभी सदस्यों को साथ मिलकर काम करना होगा। मंदिरों में समानता की खोज एक सतत प्रक्रिया है, और इसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है।

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बहुजनों के पुरखे हिन्दू नहीं बौद्ध थे महाबोधि महाविहार बहुजनों की विरासत है!

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#ब्राहमण धर्म के लोगों ने प्रतिक्रांति की गोदत्त की हत्या की बौद्धों के विहारों को तोड़ा उनके स्थानों में मन्दिर का निर्माण किया। बौद्धों का नर संघार किया। ब्राहमण धर्म के लोगों ने समाज का वर्गीकरण कर सामाजिक वैमनस्य को और अधिक प्रखर किया। बौद्ध भी   भिक्षु ,सन्त समाज के थे।

और समाज के कुछ लोगों को शु ट शुद्र और अति शुद्ध नाम दिया और समाज के कुछ लोगों को शुद्र और अति शुद्ध नाम दिया और उनको हिंदुओं के मंदिरो में प्रवेश वर्जित कर दिया।

 साथ ही साथ महिलाओ का भी वर्गीकरण कर दिया उन्हें असामाजिक तत्व मानकर समाज से बाहर निकल दिया समाज में महिलाओ के साथ भेदभाव शुरू कर दिया साथ ही साथ अनेकों कुप्रथाओ व अंधविस्वासो के अंधकार में धकेल दिया।  ब्राह्मण धर्म के लोगों ने महिलाओं को काल्पनिक देवी देवताओं के प्रति आश्रित कर लिया। पूर्व र्बौद्ध काल में मंदिरों का कोई concept नही है। यह बात हमे इतिहास बताता है।

* ब्राह्मणों में पौरोहित्य के संबंध में अधिक विशद वर्णन मिलता है। ब्रह्मण साहित्य (पुरोहितवाद ) का काल ईसा पूर्व छठी या  सातवी शताब्दी (6-7 BC ) का है। इस समय पुरोहित के कार्यक्षेत्र की रूपरेखा काफी स्पष्ट तथा विशद हो चुकी थी। भिन्न भिन्न भागों में भिन्न भिन्न संख्या में पुरोहितों की आवश्यकता होती थी।

Balwant Singh Pargai Samywadi member of cpiml uttarakhand

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हिन्दू धर्म अनेको कुप्रथाओ, अंध विश्वासओ, बौद्धिक विकास और सृजनात्मक शक्तियों को बाधित करने वाला अस्पृश्यता’ से उपजी निर्योग्यताओं, गुरु प्रथा और पुरोहितवाद जैसे अपवादों से घिरा हुआ, एक और नई सामाजिक प्रक्रिया है.

#स्कूल और कॉलेजों में कुप्रथाओं, अन्धविश्वासो को बढावा देने वाले अध्यापको/अध्यापिकाओं पर कार्यवाही आवश्यक है

#देखिये धार्मिक कुरीतिया हमारे समाज को किस तरह प्रभावित करती है

#महिलाओं और बालिकाओं के नाक कान छेदना: हानिकारक प्रथा, संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन

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*भारत का संविधान*

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 61 राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया से संबंधित है। यदि राष्ट्रपति पर संविधान के उल्लंघन का आरोप है, तो संसद के किसी भी सदन में महाभियोग का आरोप लगाया जा सकता है. यह प्रक्रिया एक संकल्प के रूप में शुरू होती है,

कोई व्यक्ति जो राष्ट्रपति के रूप में पद धारण करता है, या कर चुका होता है, इस संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए उस पद के लिए पुनः निर्वाचित का पत्र होगा होगा

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                                           {Contemporary world politics}

We tend to reply on the daily newspaper, television and casual conversation for our knowledge of how world works. What was call international politics or international relations is of course crucial. In addition on though these are vital connections between governments, non-government institutions and ordinary people. There are often referred to as transnational relations. {Contemporary world politics}

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